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गूर्वष्टकम्
गुरु पर आठ श्लोक
प्रस्तावना
यह गुर्वष्टकम् अथवा «गुरु पर आठ श्लोक» है। कभी-कभी इस स्तोत्र को यह भी कहा जाता है: गुरोरष्टकम् अथवा «गुरु के आठ श्लोक»। संक्षेप में, नाम भिन्न हैं किन्तु विषय-वस्तु वही है।
इस रचना में, महान शङ्कराचार्य हमसे हर वस्तु की व्यर्थता के विषय में बात करते हैं यदि हमारा मन गुरु (अनुग्रह प्रदान करने वाले ईश्वर) के चरण-कमलों में संलग्न न हो। इस संसार में लोग अनेक गतिविधियाँ करते हैं, किन्तु लगभग कोई भी कहीं नहीं पहुँचता। कहीं पहुँचने से मेरा तात्पर्य क्षैतिज गतियों से नहीं है, जैसा कि अनेक पशु पृथ्वी नामक इस वीरान मरुस्थल में करते हैं। नहीं, मेरा तात्पर्य एक ऊर्ध्वाधर गति से है, चेतना के उच्चतर स्तरों की ओर एक विकासात्मक आरोहण। संसार, इस विश्व की परिवर्तनशील गतिविधियों का चक्र, हमारी चेतना के स्तर के किसी भी उत्थान की ओर नहीं ले जाता। यह परमेश्वर के लिए केवल एक दिव्य लीला है किन्तु जीवित प्राणियों के लिए एक भयानक बंजर भूमि है। बाल्यावस्था से ही हम संसार में अधिकाधिक उलझते जाते हैं, और वास्तव में, हम अपना सम्पूर्ण जीवन इस चक्र में व्यतीत कर देते हैं जो कहीं नहीं ले जाता। अधिकांश लोग संसार में पूर्णतः निमग्न होकर ही प्राण त्याग देते हैं, केवल दूसरे शरीर में पुनः जन्म लेने और बिना किसी अर्थ के चक्कर काटते रहने के लिए। हाँ, यह उनके लिए एक वास्तविक त्रासदी है। हम, योगीगण, चेतना में ऊर्ध्वाधर रूप से आरोहण करने के लिए योग का अध्ययन और अभ्यास करते हैं, जिससे संसार के उस चक्र से बचा जा सके जो सब कुछ नष्ट कर देता है। हम संसार में अधिक धनवान, अधिक शक्तिशाली, अधिक सुंदर, अधिक स्वस्थ इत्यादि नहीं होना चाहते। नहीं, क्योंकि वह सब कुछ शारीरिक तथा अनित्य है और किसी स्थायी विकास की ओर नहीं ले जाता। हम चेतना के उच्चतर स्तरों की ओर आरोहण करना चाहते हैं, सीधे सर्वस्व के केंद्र तक: शिव। अस्तु, यह स्तोत्र संसार में प्रत्येक वस्तु की व्यर्थता की बात करता है यदि कोई गुरु के चरण-कमलों में दृढ़तापूर्वक आश्रित नहीं है, अर्थात्, यदि कोई चेतना की उच्च से उच्चतर अवस्थाओं की ओर एक दृढ़ ऊर्ध्वाधर आरोहण में प्रवृत्त नहीं हुआ है।
अब गुर्वष्टकम् का पाठ करें और परम आनंद का अनुभव करें, प्रिय शिव।
महत्वपूर्ण: अनुवाद में जो कुछ भी कोष्ठक के भीतर है, वह किसी दिए गए वाक्यांश या वाक्य के अर्थ को पूर्ण करने के लिए मेरे द्वारा जोड़ा गया है। इसी प्रकार, जो कुछ भी दोहरे हाइफ़न (--...--) के बीच स्थित है, वह अतिरिक्त स्पष्टीकारक जानकारी प्रस्तुत करता है जो मेरे द्वारा ही जोड़ी गई है।
गूर्वष्टकम्
शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥१॥
Śarīraṁ surūpaṁ tathā vā kalatraṁ yaśaścāru citraṁ dhanaṁ merutulyam|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||1||
शरीर (शरीरम्) सुंदर (हो सकता है) (सुरूपम्) अथवा (तथा वा) पत्नी भी (कलत्रम्)। (किसी के पास) यश/कीर्ति (यशः), कान्ति/शोभा (चारु), ललाट पर तिलक (चित्रम्), (तथा) (सुमेरु) पर्वत के समान (मेरुतुल्यम्) धन (धनम्) (हो सकता है); (किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||१||
कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥२॥
Kalatraṁ dhanaṁ putrapautrādi sarvaṁ gṛhaṁ bāndhavāḥ sarvametaddhi jātam|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||2||
पत्नी (कलत्रम्), धन (धनम्), पुत्र, पौत्र आदि (पुत्रपौत्रादि)... सब कुछ (सर्वम्)... गृह (गृहम्), बान्धव/सम्बन्धी (बान्धवाः)... यह सारा (सर्वम्) (एतद् हि) समूह (जातम्) (किसी के अपने जीवन में उपस्थित हो सकता है; किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||२||
षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥३॥
Ṣaḍaṅgādivedo mukhe śāstravidyā kavitvādi gadyaṁ supadyaṁ karoti|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||3||
छह अंगों सहित वेद आदि (षडङ्गादिवेदः), (तथा) शास्त्रों की विद्या (शास्त्रविद्या) (अपने) मुख में (विद्यमान हो सकती है) (मुखे), (और किसी के पास) कवित्व-शक्ति आदि (हो सकती है) (कवित्वादि), (तथा कोई) गद्य (गद्यम्) (और) सुंदर पद्य की रचना भी करता हो (करोति) (सुपद्यम्); (किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||३||
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥४॥
Videśeṣu mānyaḥ svadeśeṣu dhanyaḥ sadācāravृtteṣu matto na cānyaḥ|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||4||
«अन्य देशों में (विदेशेषु) सम्मानित और पूज्य (मान्यः), अपने देश में --शाब्दिक रूप से अपने देशों, प्रान्तों, राज्यों इत्यादि में-- (स्वदेशेषु) धन्य/समृद्ध (धन्यः), धन और सदाचार के आचरण में (सदाचारवृत्तेषु) मत्त/प्रसन्न रहने वाला (मुझ जैसा) कोई दूसरा बिल्कुल नहीं है (न च अन्यः) (मत्तः)»; (किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||४||
क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥५॥
Kṣamāmaṇḍale bhūpabhūpālavṛndaiḥ sadā sevitaṁ yasya pādāravindam|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||5||
(कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है) जिसके (यस्य) चरण-कमल (पादारविन्दम्) सम्पूर्ण भूमण्डल पर (क्षमामण्डले) राजाओं और नरेशों के समूहों द्वारा (भूपभूपालवृन्दैः) सदैव सेवित और पूजित हों (सदा सेवितम्); (किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||५||
यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापाज्जगद्वस्तु सर्वं करे मत्प्रसादात्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥६॥
Yaśo me gataṁ dikṣu dānapratāpājjagadvastu sarvaṁ kare matprasādāt|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||6||
(कोई ऐसा कह सकता है:) «(मेरे) दान और पराक्रम के कारण (दानप्रतापात्) मेरा (मे) यश/कीर्ति (यशः) (सभी) दिशाओं में (दिक्षु) फैल गया है (गतम्), (और) मेरी कृपा से (मत्प्रसादात्) संसार की सभी वस्तुएँ (जगद्वस्तु) (सर्वम्) (मेरे) हाथ में (हैं) (करे)»; (किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||६||
न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥७॥
Na bhoge na yoge na vā vājirājau na kāntāmukhe naiva vitteṣu cittam|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||7||
(किसी का अपना) चित्त (चित्तम्) न तो (न) भोग में (हो) (भोगे), न (न) योग में (योगे), न ही (न वा) अश्वों और राजाओं में (वाजिराजौ), न (न) प्रियतमा के मुख में (कान्तामुखे), और न ही निश्चित रूप से (नैव) धन-सम्पत्ति में (वित्तेषु); (किन्तु) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||७||
अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥८॥
Araṇye na vā svasya gehe na kārye na dehe mano vartate me tvanarghye|
Manaścenna lagnaṁ guroraṅghripadme tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kiṁ tataḥ kim||8||
(कोई यह गर्व कर सकता है कि) «मेरा (मे) मन (मनः) न तो (न) वन में (अरण्ये) और न ही (वा) अपने घर में (स्वस्य गेहे), न (न) कार्य में (कार्ये), न (न) शरीर में प्रवृत्त होता है (वर्तते), अपितु --मैं "अपि तु" की अपेक्षा कर रहा था-- (तु) अमूल्य तत्त्व में (प्रवृत्त होता है) (अनर्घ्ये)»; (इस स्थिति में भी,) यदि (चेत्) मन (मनः) गुरु (गुरोः) के चरण-कमलों में (अङ्घ्रिपद्मे) संलग्न नहीं है (लग्नम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्), तो फिर क्या (ततः किम्)?||८||
गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।
लभेद्वाञ्छितार्थं पदं ब्रह्मसञ्ज्ञं गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥
Guroraṣṭakaṁ yaḥ paṭhetpuṇyadehī yatirbhūpatirbrahmacārī ca gehī|
Labhedvāñchitārthaṁ padaṁ brahmasañjñaṁ guroruktavākye mano yasya lagnam||
वह पुण्यवान् देहधारी (पुण्यदेही) जो (यः) गुरोरष्टकम् का --शाब्दिक रूप से «गुरु के आठ श्लोक»-- (गुरोः अष्टकम्) पाठ करता है (पठेत्) (तथा) जिसका (यस्य) मन (मनः) गुरु द्वारा कहे गए वचनों में संलग्न रहता है (लग्नम्) --मैं «गुरुणोक्तवाक्ये» अधिक पसंद करता, यद्यपि यह छंद को भंग करता है-- (गुरोः उक्तवाक्ये), वह यति/संन्यासी (यतिः), राजा (भूपतिः), ब्रह्मचारी (ब्रह्मचारी) अथवा --शाब्दिक रूप से «और»-- (च) गृहस्थ (गेही) (होने पर भी), वाञ्छित फल को प्राप्त करता है (लभेत्) (वाञ्छितार्थम्) --(अर्थात्,) ब्रह्म संज्ञक (ब्रह्मसञ्ज्ञम्) परम पद को (पदम्)--||
अतिरिक्त जानकारी
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