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 भज गोविन्दम्

गोविन्द की पूजा करो!


 प्रस्तावना

गोविन्द

यह भज गोविन्दम् अथवा «गोविन्द की पूजा करो!» है। सामान्यतः यह कहा जाता है कि पूजनीय शङ्कराचार्य इस स्तोत्र के रचयिता थे, किन्तु यह विषय अधिक जटिल है।

शङ्कराचार्य ने इस स्तोत्र की रचना करने का निर्णय कैसे लिया? कथा के अनुसार, यह सब तब आरंभ हुआ जब उन्होंने देखा कि एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति पाणिनी (प्रसिद्ध वैयाकरण) के अनुसार संस्कृत के नियमों का अध्ययन कर रहा था। उस वृद्ध व्यक्ति को देखकर ऋषि करुणा से भर उठे, जब उन्हें यह अनुभव हुआ कि अपनी इस अवस्था में वह केवल उन कोरी बौद्धिक उपलब्धियों में अपना समय व्यर्थ कर रहा था। शङ्कराचार्य के अनुसार, उस व्यक्ति को मृत्यु आने से पूर्व शीघ्र मुक्ति प्राप्त करने के लिए सीधे गोविन्द (गोपालक भगवान् कृष्ण) की आराधना करने की आवश्यकता थी, न कि केवल पुस्तकीय ज्ञान में अपना अमूल्य समय नष्ट करने की।

इस स्तोत्र के रचयिता के संबंध में: प्रथम श्लोक वह ध्रुवपद (टेक) है जिसे द्वितीय से लेकर अंतिम श्लोक तक, प्रत्येक श्लोक के उपरांत गाया जाना चाहिए। इसके पश्चात्, 2 से 13 तक के श्लोक वे मूल श्लोक हैं जो महान शङ्कराचार्य ने उस वृद्ध व्यक्ति को प्रदान किए थे जो संस्कृत व्याकरण का अध्ययन कर रहा था। इसके बाद के 14 श्लोक (14 से 27) शङ्कराचार्य के 14 शिष्यों द्वारा रचे गए थे (प्रत्येक शिष्य द्वारा एक श्लोक, पद्मपाद के श्लोक से लेकर सुमति के श्लोक तक)। ऐसा प्रतीत होता है कि सुमति ने 28वाँ श्लोक भी लिखा था। 31 की संख्या पूर्ण करने तक शेष तीन श्लोक स्वयं शङ्कराचार्य द्वारा रचे गए थे। ऐसा भी माना जाता है कि शङ्कराचार्य द्वारा रचित दो अतिरिक्त श्लोक भी अस्तित्व में हैं, किन्तु वे «आधिकारिक» नहीं हैं। इसलिए मैंने उन्हें यहाँ, इस «आधिकारिक» पाठ में सम्मिलित नहीं किया है।

अब भज गोविन्दम् का पाठ करें और परम आनंद का अनुभव करें, प्रिय शिव।

महत्वपूर्ण: अनुवाद में जो कुछ भी कोष्ठक के भीतर है, वह किसी दिए गए वाक्यांश या वाक्य के अर्थ को पूर्ण करने के लिए मेरे द्वारा जोड़ा गया है। इसी प्रकार, जो कुछ भी दोहरे हाइफ़न (--...--) के बीच स्थित है, वह अतिरिक्त स्पष्टीकारक जानकारी प्रस्तुत करता है जो मेरे द्वारा ही जोड़ी गई है।

शीर्ष


 भज गोविन्दम्

ध्रुवपद
भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते।
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे॥१॥

Bhaja govindaṁ bhaja govindaṁ govindaṁ bhaja mūḍhamate|
Samprāpte sannihite kāle nahi nahi rakṣati ḍukṛṅkaraṇe||1||

पूजा करो (भज) गोविन्द की (गोविन्दम्), पूजा करो (भज) गोविन्द की (गोविन्दम्), पूजा करो (भज) गोविन्द की (गोविन्दम्), हे मूढ़ बुद्धि वाले मनुष्य --शाब्दिक रूप से «हे मोह अथवा माया के वशीभूत मन वाले», किन्तु सामान्यतः इसका अनुवाद «हे मूर्ख मन वाले», अथवा सीधे «हे मूर्ख» किया जाता है-- (मूढमते)! जब मृत्यु के सन्निकट आने का समय उपस्थित हो जाता है (सम्प्राप्ते सन्निहिते काले), तब व्याकरण का नियम --शाब्दिक रूप से «कृ धातु का प्रयोग करने के अर्थ में होता है», यह वैयाकरण पाणिनी की जटिल पारिभाषिक शब्दावली है-- (डुकृङ्करणे) कदापि रक्षा नहीं करता (नहि नहि रक्षति)!||१||


मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम्॥२॥

Mūḍha jahīhi dhanāgamatṛṣṇāṁ kuru sadbuddhiṁ manasi vitṛṣṇām|
Yallabhase nijakarmopāttaṁ vittaṁ tena vinodaya cittam||2||

हे मूर्ख! --शाब्दिक रूप से «भ्रमित, मोह अथवा माया के वशीभूत»-- (मूढ), धन के उपार्जन की तृष्णा को त्याग दो (धनागमतृष्णाम्) (जहीहि)। अपनी वास्तविक बुद्धि को (सद्बुद्धिम्) --(जो) मन में (विद्यमान है)-- (मनसि) (उस) तृष्णा से --उस तीव्र कामना से-- मुक्त करो (कुरु) (वितृष्णाम्)। जो (यद्) धन (वित्तम्) तुम प्राप्त करते हो (लभसे), (अर्थात्) जो अपने कर्मों द्वारा उपार्जित किया गया है (निजकर्मोपात्तम्), उसी से (तेन) चित्त को (चित्तम्) सन्तुष्ट करो/बहलाओ (विनोदय)||२||


नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम्।
एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥३॥

Nārīstanabharanābhīdeśaṁ dṛṣṭvā mā gā mohāveśam|
Etanmāṁsavasādivikāraṁ manasi vicintaya vāraṁ vāram||3||

स्त्री के उन्नत स्तनों तथा नाभि-प्रदेश को देखकर (दृष्ट्वा) (नारीस्तनभरनाभीदेशम्), मोह के वशीभूत मत होओ (मा गा मोहावेशम्)। अपने मन में (मनसि) बार-बार (वारं वारम्) यह विचार करो (विचिन्तय) कि यह सब (एतत्) (केवल) मांस, वसा आदि का विकार है (मांसवसादिविकारम्)||३||


नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम्॥४॥

Nalinīdalagatajalamatitaralaṁ tadvajjīvitamatiśayacapalam|
Viddhi vyādhyabhimānagrastaṁ lokaṁ śokahataṁ ca samastam||4||

कमल के पत्ते पर स्थित जल की बूँद (नलिनीदलगतजलम्) अत्यंत चंचल होती है (अतितरलम्)। उसी प्रकार (तद्वत्), जीवन (जीवितम्) अत्यधिक अस्थिर/चपल है (अतिशयचपलम्)। यह जान लो (विद्धि) कि यह समस्त (समस्तम्) संसार (लोकम्) रोग तथा अभिमान से ग्रस्त है (व्याध्यभिमानग्रस्तम्), और (च) शोक से आहत है (शोकहतम्)||४||


यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥५॥

Yāvadvittopārjanasaktastāvannijaparivāro raktaḥ|
Paścājjīvati jarjaradehe vārtāṁ ko'pi na pṛcchati gehe||5||

जब तक (यावत्) मनुष्य धन उपार्जन करने में लगा रहता है (वित्तोपार्जनसक्तः), तब तक (तावत्) उस पर आश्रित रहने वाले लोग --शाब्दिक रूप से उसका परिवार/परिकर-- (निजपरिवारः) अनुराग रखते हैं --शाब्दिक रूप से प्रेम से प्रभावित रहते हैं-- (रक्तः)। इसके उपरान्त (पश्चात्), जब वह जर्जर शरीर में (जर्जरदेहे) जीवन व्यतीत करता है (जीवति), तब घर में (गेहे) कोई भी (कोऽपि न) उसका समाचार तक नहीं (वार्ताम्) पूछता (पृच्छति)||५||


यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥६॥

Yāvatpavano nivasati dehe tāvatpṛcchati kuśalaṁ gehe|
Gatavati vāyau dehāpāye bhāryā bibhyati tasminkāye||6||

जब तक (यावत्) शरीर में (देहे) प्राणवायु का निवास रहता है (पवनः) (निवसति), तब तक (तावत्) घर में (गेहे) कुशल-क्षेम पूछा जाता है (कुशलम्) (पृच्छति)। (किन्तु) शरीर का अंत होने पर (देहापाये) जब प्राणवायु निकल जाती है (गतवति वायौ), तब पत्नी भी (भार्या) उस शरीर से --यहाँ अधिकरण कारक का प्रयोग दुर्लभ है-- (तस्मिन् काये) भयभीत होती है (बिभ्यति)||६||


बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥७॥

Bālastāvatkrīḍāsaktaḥ taruṇastāvattaruṇīsaktaḥ|
Vṛddhastāvaccintāsaktaḥ parame brahmaṇi ko'pi na saktaḥ||7||

बालक (बालः) खेल-कूद में लीन रहता है (तावत् क्रीडासक्तः), युवा (तरुणः) युवती के प्रति आसक्त रहता है (तावत् तरुणीसक्तः), वृद्ध (वृद्धः) चिन्ताओं में मग्न रहता है (तावत् चिन्तासक्तः)। (किन्तु) परब्रह्म में (परमे ब्रह्मणि) कोई भी (कोऽपि न) संलग्न नहीं होता (सक्तः)!||७||


का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं कः कुत आयातस्तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥८॥

Kā te kāntā kaste putraḥ saṁsāro'yamatīva vicitraḥ|
Kasya tvaṁ kaḥ kuta āyātastattvaṁ cintaya tadiha bhrātaḥ||8||

तुम्हारी (ते) पत्नी कौन है (का) (कान्ता)? तुम्हारा (ते) पुत्र कौन है (कः) (पुत्रः)? यह (अयम्) संसार (संसारः) अत्यंत (अतीव) विचित्र और आश्चर्यजनक है (विचित्रः)! तुम (त्वम्) किसके हो (कस्य)? तुम (त्वम्) कौन हो (कः)? तुम कहाँ से आए हो (कुतः) (आयातः)? हे भ्राता (भ्रातः), यहाँ (इह) उस (तत्) परम सत्य का चिंतन करो (तत्त्वम्) (चिन्तय)!||८||


सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥९॥

Satsaṅgatve nissaṅgatvaṁ nissaṅgatve nirmohatvam|
Nirmohatve niścalatattvaṁ niścalatattve jīvanmuktiḥ||9||

सत्संग होने पर (सत्सङ्गत्वे) अनासक्ति उत्पन्न होती है (निस्सङ्गत्वम्); अनासक्ति होने पर (निस्सङ्गत्वे) मोह का अभाव होता है (निर्मोहत्वम्); मोह का अभाव होने पर (निर्मोहत्वे) निश्चल तत्त्व की प्राप्ति होती है (निश्चलतत्त्वम्); (और) निश्चल तत्त्व की प्राप्ति होने पर (निश्चलतत्त्वे) जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है (जीवन्मुक्तिः)||९||


वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥१०॥

Vayasi gate kaḥ kāmavikāraḥ śuṣke nīre kaḥ kāsāraḥ|
Kṣīṇe vitte kaḥ parivāraḥ jñāte tattve kaḥ saṁsāraḥ||10||

आयु बीत जाने पर (वयसि गते), काम का विकार कैसा (कः) (कामविकारः)? जल सूख जाने पर (शुष्के नीरे), सरोवर कैसा (कः) (कासारः)? धन क्षीण हो जाने पर (क्षीणे वित्ते), परिवार कैसा (कः) (परिवारः)? तत्त्व का ज्ञान हो जाने पर (ज्ञाते तत्त्वे), संसार कैसा (कः) (संसारः)?||१०||


मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम्।
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥११॥

Mā kuru dhanajanayauvanagarvaṁ harati nimeṣātkālaḥ sarvam|
Māyāmayamidamakhilaṁ hitvā brahmapadaṁ tvaṁ praviśa viditvā||11||

धन, जन और यौवन का गर्व मत करो --मैं यहाँ «मा कार्षीः» देखना अधिक पसंद करता-- (मा कुरु धनजनयौवनगर्वम्)। काल --अथवा «मृत्यु»-- (कालः) पलक झपकते ही (निमेषात्) सब कुछ हरण कर लेता है (हरति) (सर्वम्)। माया से युक्त (मायामयम्) इस सम्पूर्ण जगत को छोड़कर (इदम् अखिलम्) (हित्वा), (तथा) ब्रह्मपद को जानकर (ब्रह्मपदम्) (विदित्वा), तुम (उसमें) प्रवेश करो (त्वम्) (प्रविश)||११||


दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥१२॥

Dinayāminyau sāyaṁ prātaḥ śiśiravasantau punarāyātaḥ|
Kālaḥ krīḍati gacchatyāyustadapi na muñcatyāśāvāyuḥ||12||

दिन और रात (दिनयामिन्यौ), सांध्यकाल (सायम्) (तथा) प्रातःकाल (प्रातः), शिशिर और वसंत ऋतु बार-बार आते और जाते हैं (शिशिरवसन्तौ) (पुनरायातः)। काल क्रीड़ा करता है (कालः) (क्रीडति) (और) आयु बीतती जाती है (गच्छति) (आयुः)। फिर भी (तदपि), आशा रूपी वायु पीछा नहीं छोड़ती (न मुञ्चति) (आशावायुः)||१२||


का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।
त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका॥१३॥

Kā te kāntā dhanagatacintā vātula kiṁ tava nāsti niyantā|
Trijagati sajjanasaṅgatirekā bhavati bhavārṇavataraṇe naukā||13||

तुम्हारी (ते) पत्नी कौन है (का) (कान्ता)? धन के विषय में तुम्हारी चिन्ता कैसी (धनगतचिन्ता)? हे बावले मनुष्य (वातुल)! क्या तुम्हारा कोई नियंता/मार्गदर्शक नहीं है (किं तव नास्ति) (नियन्ता)? तीनों लोकों में --स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में-- (त्रिजगति) संसार रूपी सागर को पार करने के लिए (भवार्णवतरणे) केवल एक ही (एका) नौका है (भवति) (नौका), (और वह है) सत्पुरुषों की संगति --अर्थात् «पवित्र पुरुषों का संग»-- (सज्जनसङ्गतिः)||१३||


द्वादशमञ्जरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः।
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः श्रीमच्छङ्करभगवच्छरणैः॥

Dvādaśamañjarikābhiraśeṣaḥ kathito vaiyākaraṇasyaiṣaḥ|
Upadeśo'bhūdvidyānipuṇaiḥ śrīmacchaṅkarabhagavaccharaṇaiḥ||

बारह पदों द्वारा --यह बारह श्लोकों (2-13) की ओर संकेत करता है-- (द्वादशमञ्जरिकाभिः), यह (एषः) सम्पूर्ण (अशेषः) उपदेश (उपदेशः) विद्या में परम निपुण, अत्यंत पूज्य और महिमामयी भगवान् शङ्कराचार्य के चरणों द्वारा (विद्यानिपुणैः) (श्रीमच्छङ्करभगवच्छरणैः) उस वैयाकरण को दिया गया था (कथितः अभूत्) (वैयाकरणस्य)||१३.१||


जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥१४॥

Jaṭilo muṇḍī luñcitakeśaḥ kāṣāyāmbarabahukṛtaveṣaḥ|
Paśyannapi ca na paśyati mūḍho hyudaranimittaṁ bahukṛtaveṣaḥ||14||

जटाधारी होकर (जटिलः), मुण्डित सिर वाले होकर (मुण्डी), उखाड़े हुए बालों वाले होकर (लुञ्चितकेशः), अथवा गेरुए वस्त्रों से अनेक प्रकार के वेश बनाकर (काषायाम्बरबहुकृतवेषः), देखते हुए भी (पश्यन् अपि च) वह मूर्ख मनुष्य --शाब्दिक रूप से «जो माया के वशीभूत है»-- (मूढः) नहीं देखता है (न पश्यति), क्योंकि (हि) यह अनेक प्रकार का वेश (बहुकृतवेषः) (केवल) पेट भरने के लिए ही बनाया गया है (उदरनिमित्तम्)||१४||


अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥१५॥

Aṅgaṁ galitaṁ palitaṁ muṇḍaṁ daśanavihīnaṁ jātaṁ tuṇḍam|
Vṛddho yāti gṛhītvā daṇḍaṁ tadapi na muñcatyāśāpiṇḍam||15||

अंग शिथिल हो गए हैं (अङ्गम्) (गलितम्), सिर के बाल श्वेत हो गए हैं (पलितम् मुण्डम्), मुख दन्तरहित हो गया है (दशनविहीनम् जातम्) (तुण्डम्)। वृद्ध पुरुष (वृद्धः) लाठी का सहारा लेकर (गृहीत्वा) (दण्डम्) चलता है (याति)। फिर भी (तदपि), आशाओं का पिण्ड/पुंज छूटता नहीं है (न मुञ्चति) (आशापिण्डम्)||१५||


अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षस्तरुतलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥१६॥

Agre vahniḥ pṛṣṭhe bhānuḥ rātrau cubukasamarpitajānuḥ|
Karatalabhikṣastarutalavāsastadapi na muñcatyāśāpāśaḥ||16||

आगे अग्नि (अग्रे) (वह्निः), पीछे सूर्य (पृष्ठे) (भानुः)। रात्रि में (रात्रौ) (घुटनों को मोड़कर) ठोड़ी से लगाए हुए (चुबुकसमर्पितजानुः)। हथेलियों में भिक्षा लेकर (करतलभिक्षः), वृक्ष के नीचे समतल भूमि पर निवास करता है (तरुतलवासः)। उस सबके उपरान्त भी (तदपि), आशाओं का बंधन शिथिल नहीं होता (न मुञ्चति) (आशापाशः)||१६||


कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीनः सर्वमनेन मुक्तिर्न भवति जन्मशतेन॥१७॥

Kurute gaṅgāsāgaragamanaṁ vrataparipālanamathavā dānam|
Jñānavihīnaḥ sarvamanena muktirna bhavati janmaśatena||17||

कोई गंगासागर --जहाँ गंगा समुद्र में मिलती है-- की यात्रा करता है (कुरुते गङ्गासागरगमनम्), व्रतों का पालन करता है (कुरुते व्रतपरिपालनम्), अथवा (अथवा) दान करता है (कुरुते दानम्)। (किन्तु यदि यह सब) ज्ञान के बिना किया जाए (ज्ञानविहीनः), तो इस सब से (सर्वम्) (अनेन) सौ जन्मों में भी (जन्मशतेन) मुक्ति प्राप्त नहीं होती (मुक्तिः) (न भवति)||१७||


सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः शय्याभूतलमजिनं वासः।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः॥१८॥

Suramandiratarumūlanivāsaḥ śayyābhūtalamajinaṁ vāsaḥ|
Sarvaparigrahabhogatyāgaḥ kasya sukhaṁ na karoti virāgaḥ||18||

देव-मन्दिर में अथवा वृक्ष के मूल में निवास करना (सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः), पृथ्वी की सतह को शय्या बनाना (शय्याभूतलम्), मृगचर्म को वस्त्र के रूप में धारण करना (अजिनम्) (वासः), (तथा) सभी प्रकार के परिग्रह और भोगों का त्याग कर देना (सर्वपरिग्रहभोगत्यागः)... ऐसा वैराग्य (विरागः) किसे (कस्य) सुख प्रदान नहीं करता (सुखम्) (न करोति)?||१८||


योगरतो वा भोगरतो वा सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥१९॥

Yogarato vā bhogarato vā saṅgarato vā saṅgavihīnaḥ|
Yasya brahmaṇi ramate cittaṁ nandati nandati nandatyeva||19||

(कोई) योग में लीन हो (योगरतः) अथवा (वा) सांसारिक भोगों में रत हो (भोगरतः), अथवा (वा) आसक्ति में अनुरक्त हो (सङ्गरतः) अथवा (वा) सर्वथा संग-रहित हो (सङ्गविहीनः)... (किन्तु) केवल वही अत्यंत आनंदित होता है (नन्दति नन्दति नन्दति एव) जिसका (यस्य) चित्त (चित्तम्) ब्रह्म में रमण करता है (ब्रह्मणि) (रमते)||१९||


भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता।
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥२०॥

Bhagavadgītā kiñcidadhītā gaṅgājalalavakaṇikā pītā|
Sakṛdapi yena murārisamarcā kriyate tasya yamena na carcā||20||

(यदि) भगवद्गीता का (भगवद्गीता) किंचित् मात्र भी अध्ययन किया गया हो (किञ्चित्) (अधीता), (यदि) गंगाजल की एक छोटी बूँद भी पी गई हो (गङ्गाजललवकणिका) (पीता), यदि किसी के द्वारा (येन) एक बार भी (सकृत् अपि) मुरारी --मुर दैत्य के शत्रु भगवान् कृष्ण-- की सम्यक् पूजा की जाती है (मुरारिसमर्चा) (क्रियते), (तो) उसका (तस्य) यमराज के साथ --मृत्यु के देवता के साथ-- (यमेन) कोई विवाद/चर्चा नहीं होती (न चर्चा)||२०||


पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥२१॥

Punarapi jananaṁ punarapi maraṇaṁ punarapi jananījaṭhare śayanam|
Iha saṁsāre bahudustāre kṛpayā'pāre pāhi murāre||21||

पुनः जन्म (पुनर् अपि) (जननम्), पुनः मृत्यु (पुनर् अपि) (मरणम्), पुनः माता के गर्भ में शयन करना (पुनर् अपि) (जननीजठरे) (शयनम्)! यहाँ (इह), इस अत्यंत पार करने में कठिन, अपार संसार में (संसारे बहुदुस्तारे) (अपारे), हे मुरारी (मुरारे), कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए --शाब्दिक रूप से रक्षा कीजिए-- (कृपया) (पाहि)!||२१||


रथ्याचर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः।
योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव॥२२॥

Rathyācarpaṭaviracitakanthaḥ puṇyāpuṇyavivarjitapanthaḥ|
Yogī yoganiyojitacitto ramate bālonmattavadeva||22||

मार्ग में मिले फटे वस्त्रों से बनी गुदड़ी धारण करने वाला (रथ्याचर्पटविरचितकन्थः), पुण्य और पाप से रहित मार्ग पर चलने वाला --अथवा «पुण्य और पाप से मुक्त होकर», यद्यपि यहाँ इसका कोई विशेष अर्थ नहीं निकलता-- (पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः), योग में अपने चित्त को लगाने वाला (योगनियोजितचित्तः) योगी (योगी) बालक अथवा उन्मत्त के सदृश ही आनंद से विचरण करता है (रमते) (बालोन्मत्तवत् एव)||२२||


कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम्॥२३॥

Kastvaṁ ko'haṁ kuta āyātaḥ kā me jananī ko me tātaḥ|
Iti paribhāvaya sarvamasāraṁ viśvaṁ tyaktvā svapnavicāram||23||

इस प्रकार निरंतर विचार करो (इति परिभावय): «तुम कौन हो (कः) (त्वम्)? मैं कौन हूँ (कः) (अहम्)? मैं कहाँ से आया हूँ (कुतः) (आयातः)? मेरी माता कौन है (का) (मे) (जननी)? मेरे पिता कौन हैं (कः) (मे) (तातः)?», (तथा) इस स्वप्न के विचार सदृश (स्वप्नविचारम्), असार (असारम्) समस्त (सर्वम्) संसार को त्याग दो (विश्वम्) (त्यक्त्वा)||२३||


त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुर्व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥२४॥

Tvayi mayi cānyatraiko viṣṇurvyarthaṁ kupyasi mayyasahiṣṇuḥ|
Bhava samacittaḥ sarvatra tvaṁ vāñchasyacirādyadi viṣṇutvam||24||

तुममें (त्वयि), मुझमें (मयि) और (च) अन्यत्र भी (अन्यत्र) एक ही (एकः) विष्णु विद्यमान हैं (विष्णुः)। तुम क्रोधित होते हो (कुप्यसि), मेरे प्रति असहिष्णु हो रहे हो (मयि असहिष्णुः)... यह सब व्यर्थ है (व्यर्थम्)। यदि (यदि) तुम शीघ्र ही (अचिरात्) विष्णुत्व प्राप्त करना चाहते हो (त्वम्) (वाञ्छसि) (विष्णुत्वम्), तो सर्वत्र --अथवा «सभी के प्रति»-- (सर्वत्र) समचित्त वाले बनो (भव) (समचित्तः)||२४||


शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥२५॥

Śatrau mitre putre bandhau mā kuru yatnaṁ vigrahasandhau|
Sarvasminnapi paśyātmānaṁ sarvatrotsṛja bhedājñānam||25||

शत्रु, मित्र, पुत्र अथवा बन्धु-बान्धवों के प्रति (शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ) युद्ध अथवा सन्धि का प्रयत्न मत करो --क्रमशः-- (मा कुरु) (यत्नम्) (विग्रहसन्धौ)। सभी में (सर्वस्मिन् अपि) अपने आत्मस्वरूप को देखो (पश्य आत्मानम्), और सर्वत्र/सदा (सर्वत्र) भेद रूपी अज्ञान का त्याग कर दो (उत्सृज) (भेदाज्ञानम्)||२५||


कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं भावय कोऽहम्।
आत्मज्ञानविहीना मूढास्ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥२६॥

Kāmaṁ krodhaṁ lobhaṁ mohaṁ tyaktvātmānaṁ bhāvaya ko'ham|
Ātmajñānavihīnā मूढास्ते pacyante narakanigūḍhāḥ||26||

काम (कामम्), क्रोध (क्रोधम्), लोभ (लोभम्) और मोह को त्यागकर (मोहम्) (त्यक्त्वा), स्वयं का चिंतन करो --«आत्मतत्त्व पर विचार करो!» भी-- (आत्मानम् भावय)! मैं कौन हूँ (कः) (अहम्)? जो मूर्ख पुरुष (मूढाः) आत्मज्ञान से विहीन होते हैं (आत्मज्ञानविहीनाः), वे (ते) नरक में छिपे हुए --यदि यहाँ इसका कोई अर्थ है-- (नरकनिगूढाः) वहीं तप्त होते और यातना भोगते हैं (पच्यन्ते)||२६||


गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।
नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम्॥२७॥

Geyaṁ gītānāmasahasraṁ dhyeyaṁ śrīpatirūpamajasram|
Neyaṁ sajjanasaṅge cittaṁ deyaṁ dīnajanāya ca vittam||27||

गीता और विष्णुसहस्रनाम का गान करना चाहिए (गेयम्) (गीतानामसहस्रम्); भगवान् श्रीपति के स्वरूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए (ध्येयम्) (श्रीपतिरूपम्) (अजस्रम्); चित्त को (चित्तम्) सत्पुरुषों की संगति में ले जाना चाहिए (नेयम्) (सज्जनसङ्गे); और (च) दीन-दुखियों को धन दान करना चाहिए (दीनजनाय) (वित्तम्) (देयम्)||२७||


सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥२८॥

Sukhataḥ kriyate rāmābhogaḥ paścāddhanta śarīre rogaḥ|
Yadyapi loke maraṇaṁ śaraṇaṁ tadapi na muñcati pāpācaraṇam||28||

सुख की प्राप्ति के लिए सुंदर स्त्री का भोग किया जाता है --अर्थात् «उसके साथ रहने का सुख»-- (सुखतः) (क्रियते) (रामाभोगः)। इसके उपरान्त, हा कष्ट! (पश्चात्) (हन्त), शरीर में रोग उत्पन्न होता है (शरीरे) (रोगः)। यद्यपि (यद्यपि) संसार में (लोके) मृत्यु ही एकमात्र शरण है (मरणम्) (शरणम्), तथापि (तदपि) मनुष्य पापाचरण का त्याग नहीं करता (न मुञ्चति) (पापाचरणम्)||२८||


अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्तिततः सुखलेशः सत्यम्।
पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥२९॥

Arthamanarthaṁ bhāvaya nityaṁ nāstitataḥ sukhaleśaḥ satyam|
Putrādapi dhanabhājāṁ bhītiḥ sarvatraiṣā vihitā rītiḥ||29||

सदा (नित्यम्) धन को (अर्थम्) अनर्थकारी समझो (अनर्थम्) (भावय)। सत्य तो यह है (सत्यम्) कि उससे (ततः) लेशमात्र भी सुख नहीं मिलता (नास्ति) (सुखलेशः)। धनवानों को (धनभाजाम्) अपने पुत्र से भी (पुत्रात् अपि) भय बना रहता है (भीतिः)। सर्वत्र (सर्वत्र) (धन के संबंध में) यही (एषा) परम्परा/रीति देखी जाती है (विहिता) (रीतिः)||२९||


प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्यविवेकविचारम्।
जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम्॥३०॥

Prāṇāyāmaṁ pratyāhāraṁ nityānityavivekavicāram|
Jāpyasametasamādhividhānaṁ kurvavadhānaṁ mahadavadhānam||30||

सावधानीपूर्वक --मैं यहाँ «अविधानात्» देखना अधिक पसंद करता-- (अवधानम्), बड़ी सावधानीपूर्वक (महत् अवधानम्) प्राणायाम --प्राण ऊर्जाओं का नियमन-- (प्राणायामम्), प्रत्याहार --इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाना-- (प्रत्याहारम्), नित्य और अनित्य वस्तुओं के विवेक का विचार (नित्यानित्यविवेकविचारम्), और मन्त्र अथवा प्रार्थना के जप से युक्त समाधि का विधान करो (जाप्यसमेतसमाधिविधानम्) (कुरु)||३०||


गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्त संसारादचिराद्भव मुक्तः।
सेन्द्रियमानसनियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम्॥३१॥

Gurucaraṇāmbujanirbharabhakta saṁsārādacirādbhava muktaḥ|
Sendriyamānasaniyamādevaṁ drakṣyasi nijahṛdayasthaṁ devam||31||

हे गुरु के चरण-कमलों के अनन्य भक्त (गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्त), शीघ्र ही (अचिरात्) संसार से मुक्त हो जाओ (संसारात्) (भव मुक्तः)! इन्द्रियों सहित मन का संयम करने से ही (सेन्द्रियमानसनियमात् एव), इस प्रकार (एवम्) तुम अपने हृदय में स्थित परमात्मा के दर्शन करोगे (द्रक्ष्यसि) (निजहृदयस्थम्) (देवम्)!||३१||

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